बिलासपुर। क्या आपने कभी सुना है कि जो अधिकारी सरकारी खजाने की रक्षा करे, उसे ही सूली पर चढ़ा दिया जाए? और जिन अधिकारियों ने करोड़ों की बंदरबांट की हो, वे वातानुकूलित कमरों में मौज करें? जी हां, बिलासपुर के अरपा भैंसाझार परियोजना के 27 करोड़ रुपये के मुआवजा घोटाले में बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। किसानों के खेतों की प्यास बुझाने के लिए बनी यह योजना भ्रष्ट अफसरों और भू-माफियाओं के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गई।

सिस्टम की अंधेरगर्दी देखिए, इस घोटाले में 10 एसडीएम (SDM) स्तर के अधिकारियों की संलिप्तता दस्तावेजों में साफ - साफ दर्ज है, लेकिन पूरी गाज गिराई गई सिर्फ तत्कालीन SDM आनंद स्वरूप तिवारी पर। इस पूरे मामले ने प्रशासन की तथाकथित निष्पक्ष जांच की पोल खोलकर रख दी है।

ईमानदारी की सजा: जिसने खजाना लुटाने से रोका, उन्हीं को बनाया निशाना...

इस महाघोटाले की पटकथा किसी फिल्मी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं है। 104 गांवों की जमीन अधिग्रहण की इस जटिल प्रक्रिया में 11 अनुविभागीय अधिकारियों (SDM) ने काम किया। लेकिन हैरत की बात यह है कि जिस आनंद स्वरूप तिवारी को बलि का बकरा बनाया गया है, उनकी भूमिका केवल एक गांव 'सकरी' तक सीमित थी।

दस्तावेज कहते हैं कि सकरी गांव में धारा 11 का प्रकाशन 18 जनवरी 2019 को तत्कालीन एसडीएम कीर्तिमान सिंह राठौर ने किया था। इसके बाद धारा 19 का प्रकाशन 19 जुलाई 2019 (19/07/2019) को आशुतोष चतुर्वेदी द्वारा किया गया। धारा 21 की कार्यवाही सुमित अग्रवाल ने पूरी की। यानी तिवारी के प्रभार संभालने से बहुत पहले ही वैधानिक कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी थी। फिर 11 अधिकारियों के सामूहिक 'खेल' की सजा एक अकेले तिवारी को क्यों?

ब्लैकमेलिंग का खेल: अवैध कब्जाधारियों ने रची साजिश

इस पूरे फर्जीवाड़े की जड़ में जलसंसाधन विभाग के एक बड़े रसूखदार अधिकारी के रिश्तेदार और पेशे से ठेकेदार पवन अग्रवाल  जिसने नियम-कानून को ताक पर रखकर सरकारी पैसों पर डाका डालने की कोशिश की।

नियम साफ है: मुआवजा सिर्फ जमीन के असली और पंजीकृत मालिक को मिलता है।

 

बी.एन. मिश्रा का फर्जीवाड़ा: बी.एन. मिश्रा ने तो सीधे सरकारी जमीन पर ही कब्जा कर रखा था और उसी अवैध कब्जे के आधार पर मुआवजे की मांग कर रहा था।

 पवन अग्रवाल  ने की धोखाधड़ी : राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार खसरा नंबर 19 की असली मालकिन शारदा देवी अग्रवाल थीं (जिन्हें नियमतः मुआवजा मिला)। लेकिन पवन अग्रवाल इस खसरा नंबर 19 पर अनाधिकृत और अवैध कब्जे का दावा ठोक कर मुआवजे की मांग कर रहा था। पवन की खुद की जमीन (खसरा नंबर 40/08) बन रही नहर से कोसों दूर थी।

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जब तत्कालीन एसडीएम आनंद स्वरूप तिवारी के पास यह मामला आया, तो उन्होंने नियमों का सख्ती से पालन करते हुए इन दोनों कब्जाधारियों को सरकारी खजाने से फूटी कौड़ी देने से साफ मना कर दिया। इसी बौखलाहट में पवन अग्रवाल ने अधिकारी को नौकरी से निकलवाने की धमकी दी और झूठी शिकायतों का पुलिंदा तैयार कर दिया। 23 फरवरी 2023 को अतिरिक्त कलेक्टर की जांच समिति ने भी माना कि पवन अग्रवाल की जमीन नहर से प्रभावित ही नहीं है, फिर भी सिस्टम ने ईमानदार अफसर को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।

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करोड़ों डकारने वाले 10 'लाडले' अफसरों की  करतूतें

प्रशासन ने उन 10 अफसरों की तरफ से पूरी तरह आंखें मूंद रखी हैं, जिन्होंने बिना किसी वैधानिक प्रकाशन के मुआवजे की रेवड़ियां बांटी। सरकारी रिकॉर्ड के पन्ने पलटें तो सिस्टम का असली भ्रष्टाचार सामने आता है:

 कीर्तिमान सिंह राठौर: 27 गांवों के 107 खसरों को बिना धारा 11 और 19 के जोड़ दिया, 70 खसरों का रकबा मनमाने ढंग से बढ़ा दिया।

 दिलेराम डाहिरे: 16 गांवों के 72 खसरों को बिना प्रकाशन जोड़ा, 42 का रकबा बढ़ाया।

 आशुतोष चतुर्वेदी: 7 गांवों के 82 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 42 का रकबा बढ़ाया।

 देवेंद्र पटेल: 7 गांवों के 60 खसरे मुआवजे की सूची में डाले।

 अखिलेश साहू: 7 गांवों के 30 खसरे जोड़े।

 एस.पी. वैद्य: 6 गांवों के 23 खसरे शामिल किए।

 राजेंद्र गुप्ता (3 गांव - 5 खसरे), नूतन कंवर (2 गांव - 5 खसरे), देवेश कुमार ध्रुव (13 खसरे) और वीरेंद्र लकड़ा (5 खसरे): इन सबने बिना किसी वैधानिक प्रकाशन के अपात्रों को मुआवजा सूची में घुसा दिया।इन 10 अफसरों ने मिलकर शासन को 27 करोड़ का चूना लगाया, लेकिन आज तक इनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई!

 

ईडी (ED) की एंट्री से उड़ी नींद, पर जांच पर अभी भी सवाल

प्रवर्तन निदेशालय (ED) का पत्र आते ही बिलासपुर प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूट गई है। आनन-फानन में संभागायुक्त ने अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में संयुक्त कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर और राजस्व अधिकारियों की 4 सदस्यीय नई जांच समिति बना दी है। समिति को 15 दिन में रिपोर्ट देनी है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है: प्रशासन आखिर किसको बचाना चाहता है? वर्तमान में जांच का दायरा सिर्फ 'सकरी' गांव तक समेटने की साजिश रची जा रही है। जबकि यह महाघोटाला एक-दो नहीं, बल्कि सभी प्रभावित गांवों में फैला है।

अब प्रश्न यह है कि जब भ्रष्टाचार 104 गांवों में हुआ है, तो जांच केवल सकरी गांव की क्यों? जांच सभी गांवों की होनी चाहिए! जब तक इस जांच के दायरे में बिना प्रकाशन के खसरे जोड़ने वाले सभी 10 पूर्व एसडीएम नहीं आते और संपूर्ण गांवों के अवार्ड पारित होने की प्रक्रिया की फाइलें नहीं खुलतीं, तब तक यह जांच सिर्फ एक दिखावा मात्र है।