
बिलासपुर : हिंदू धर्म में माता-पिता का स्थान देवताओं के समान माना गया है। उनके देहावसान के बाद श्राद्ध और पिंडदान के जरिए संतान अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करती है। पितृपक्ष आते ही बिहार के गया से लेकर उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम तक पिंडदान और तर्पण की परंपरा निभाई जाती है। लेकिन इन धार्मिक स्थलों को लेकर एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि जब गया को पिंडदान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, तो फिर मां का पिंडदान बद्रीनाथ में ही क्यों किया जाता है? क्या गया में मां का पिंडदान नहीं हो सकता? धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के बीच छिपे इस सवाल का जवाब समझने के लिए दोनों तीर्थों की महत्ता को जानना जरूरी है।
ब्रह्मकपाल जहां पितरों की मुक्ति की हैं मान्यता
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ धाम केवल भगवान विष्णु की आराधना के लिए ही नहीं, बल्कि पितृकर्म के लिए भी विशेष महत्व रखता है। बद्रीनाथ मंदिर के समीप अलकनंदा नदी के तट पर स्थित ब्रह्मकपाल को पिंडदान और श्राद्ध का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ब्रह्मकपाल में पितरों के निमित्त पिंडदान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां अपने दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने पहुंचते हैं। ब्रह्मकपाल से जुड़ी पौराणिक मान्यता भगवान शिव और ब्रह्मा से संबंधित है। कहा जाता है कि भगवान शिव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति इसी स्थान पर मिली थी। इसी धार्मिक कथा के कारण इस तीर्थ को पितृकर्म के लिए विशेष महत्व प्राप्त हुआ। कुछ धार्मिक परंपराओं में यहां पिंडदान को अंतिम पितृकर्म भी माना जाता है। हालांकि, यह मान्यता सभी परिवारों और परंपराओं में एक समान नहीं है।
गया में पिंडदान से जुडी हैं मोक्ष की मान्यता
बिहार का गया पितृकर्म के लिए देश के सबसे प्रसिद्ध तीर्थों में शामिल है। यहां फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट का विशेष धार्मिक महत्व है। पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और तर्पण करते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, गया में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि गया को पितृमोक्ष की भूमि भी कहा जाता है।गया में केवल पिता या पुरुष पूर्वजों के लिए ही नहीं, बल्कि माता सहित अन्य दिवंगत परिजनों के लिए भी पिंडदान किया जाता है। इसलिए यह धारणा सही नहीं है कि गया में मां का पिंडदान नहीं हो सकता।
मां के पिंडदान के लिए बद्रीनाथ जाने की परंपरा क्यों?
इस सवाल का जवाब किसी एक धार्मिक नियम में नहीं, बल्कि आस्था, पारिवारिक परंपरा और तीर्थ की मान्यता में छिपा है। कुछ परिवारों में माता के पिंडदान के लिए बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल जाने की परंपरा रही है। इसके पीछे भगवान विष्णु के धाम की महत्ता और ब्रह्मकपाल में पितरों की मुक्ति की मान्यता प्रमुख मानी जाती है। वहीं कुछ परिवार गया में ही माता-पिता दोनों का पिंडदान कराते हैं। कई लोग अपने कुल पुरोहित की सलाह और पारिवारिक रीति के अनुसार तीर्थ का चयन करते हैं। इसलिए मां का पिंडदान केवल बद्रीनाथ में ही होना चाहिए, ऐसा कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है। गया और बद्रीनाथ दोनों ही पितृकर्म के प्रमुख तीर्थ हैं, लेकिन उनकी धार्मिक परंपराएं अलग-अलग हैं।
क्या गया में पिंडदान के बाद बद्रीनाथ जाना जरूरी है?
कुछ परिवारों में गया और बद्रीनाथ दोनों स्थानों पर पिंडदान कराने की परंपरा हो सकती है, लेकिन सभी के लिए दोनों जगह जाना अनिवार्य है, ऐसा कोई एक समान नियम नहीं है। धार्मिक कर्मकांड में परिवार की परंपरा, कुल पुरोहित का मार्गदर्शन और संबंधित विधि का महत्व होता है। इसलिए यदि किसी परिवार में बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में पिंडदान कराने की परंपरा है, तो वह उसका पालन कर सकता है। वहीं गया में पिंडदान कराने वाले परिवारों को यह मानने की आवश्यकता नहीं कि उनका पितृकर्म अधूरा रह गया।
आस्था का केंद्र है संतान का श्रद्धाभाव
मां का स्थान जीवन में सबसे ऊंचा माना जाता है। उसके जाने के बाद संतान द्वारा किया गया श्राद्ध और पिंडदान केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि उसके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम भी है। बद्रीनाथ का ब्रह्मकपाल हो या गया का विष्णुपद मंदिर, दोनों ही स्थानों से जुड़ी मान्यताएं पितरों के प्रति सम्मान और मोक्ष की कामना को दर्शाती हैं। मां का पिंडदान बद्रीनाथ में ही हो सकता है, यह धारणा सही नहीं है। गया में भी माता के लिए पिंडदान किया जाता है। दोनों तीर्थों की अपनी धार्मिक महत्ता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृकर्म कर सकते हैं। आखिरकार, पिंडदान का मूल भाव किसी एक स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि दिवंगत माता-पिता के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता है।
