रायपुर। छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग के 2549 करोड़ रुपये के एक बड़े टेंडर में भारी गड़बड़ी का मामला सामने आया है। सिकासर से कोडार रिजर्वॉयर लिंक कैनाल प्रोजेक्ट का ठेका नियमों को ताक पर रखकर दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड को दे दिया गया है। दस्तावेजों से पता चलता है कि यह कंपनी टेंडर की बुनियादी शर्तें ही पूरी नहीं करती है। इस मामले में ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के लिए विभाग के अंदर से भारी दबाव की बात सामने आई है। चर्चा है कि इसी अनुचित दबाव के चलते मुख्य अभियंता कुबेर सिंग गुरुवार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

टेंडर की शर्तों के अनुसार यह निर्माण कार्य 30 महीने में पूरा करना है। इसके बाद अगले 5 साल तक इसके संचालन और रखरखाव का जिम्मा भी ठेकेदार का होगा। निविदा की कंडिका 4.1 और 3.8 ए में साफ लिखा है कि ठेकेदार के पास मुख्य ठेकेदार के रूप में काम करने का अनुभव होना चाहिए। इस टेंडर में किसी भी तरह के जॉइंट वेंचर या संयुक्त उपक्रम को हिस्सा लेने की सख्त मनाही है। नियम कहता है कि कंपनी के पास टेंडर राशि का कम से कम 50 प्रतिशत यानी 1274 करोड़ रुपये का एक समान काम पूरा करने का अनुभव होना चाहिए। अगर दो काम दिखाए जाते हैं तो दोनों 40 प्रतिशत राशि के होने चाहिए।

दस्तावेजों के मुताबिक दिलीप बिल्डकॉन ने मध्य प्रदेश जल निगम की गांधी सागर 2 मल्टी विलेज स्कीम का अनुभव प्रमाण पत्र लगाया है। यह प्रोजेक्ट 1400 करोड़ रुपये का था जिसमें से 1302 करोड़ रुपये का काम पूरा हुआ। लेकिन यह काम दिलीप बिल्डकॉन ने अकेले नहीं बल्कि एक जॉइंट वेंचर में किया था। इसमें दिलीप बिल्डकॉन की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत और स्काईवे इंफ्राप्रोजेक्ट्स की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत थी। 65 प्रतिशत के हिसाब से दिलीप बिल्डकॉन का अनुभव केवल 846 करोड़ रुपये बैठता है जो कि जरूरी 1274 करोड़ रुपये से काफी कम है।

कंपनी ने एक और काम मल्हागढ़ माइक्रो लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट का दिखाया है। इसकी कुल लागत 678 करोड़ रुपये थी। यह काम भी जॉइंट वेंचर में हुआ था लेकिन इसमें कंपनी की हिस्सेदारी का प्रतिशत तक नहीं बताया गया है। यह 678 करोड़ की राशि दोनों भागीदारों की संयुक्त लागत है। ऐसे में दिलीप बिल्डकॉन के हिस्से का अनुभव इससे भी कम होता है।

आरोप है कि मध्य प्रदेश जल निगम पीआईयू नीमच के महाप्रबंधक ने नियमों के खिलाफ जाकर एक ऐसा प्रमाण पत्र जारी किया जिसमें पूरे काम का श्रेय केवल दिलीप बिल्डकॉन को दे दिया गया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह सीधे तौर पर कूट रचना है ताकि एक अपात्र ठेकेदार को टेंडर के लिए पात्र बनाया जा सके। कार्य अनुभव का मूल्यांकन केवल 65 प्रतिशत के आधार पर होना था लेकिन गलत प्रमाण पत्र बनाकर विभाग की आंखों में धूल झोंकी गई।

ऑनलाइन रिकॉर्ड बताते हैं कि 27 जुलाई 2026 की रात सवा दस बजे टेंडर की दरें खोली गईं। इसमें दिलीप बिल्डकॉन ने 2524 करोड़ रुपये की बोली लगाई और वह पहले नंबर पर रही। दूसरी तरफ एनसीसी लिमिटेड ने 2600 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। टेंडर में तय अनुभव और मात्रा की शर्तों को पूरा न करने के बावजूद दिलीप बिल्डकॉन को टेंडर दे दिया गया।

अब इस पूरे मामले में अपात्र ठेकेदार को तुरंत टेंडर प्रक्रिया से बाहर करने की मांग उठ रही है। जल संसाधन विभाग के कुछ अधिकारियों पर अपने निजी स्वार्थ के लिए साजिश रचने का गंभीर आरोप लगा है। चीफ इंजीनियर के इस्तीफे ने इस संभावित घोटाले की गहराई को उजागर कर दिया है। सरकार और प्रशासन से इस दूषित निविदा प्रक्रिया की पारदर्शी जांच की मांग की जा रही है।