
पीएम जनमन योजना में 420 करोड़ का 'डामर घोटाला', पेटी ठेकेदारों के हवाले काम, हाथ लगाते ही उखड़ रही सड़कें
Author: Manishankar PandeyPublished: 28 Apr 2026

NJV Desk / बिलासपुर
प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी 'पीएम जनमन योजना' (PM JANMAN Yojana), जिसे विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों (बैगा आदिवासियों) के उत्थान और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शुरू किया गया था, बिलासपुर जिले में भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। कोटा-बेलगहना क्षेत्र में 420.14 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रही 31 सड़कों की गुणवत्ता ने पूरे प्रशासनिक और निर्माण सिस्टम की पोल खोल कर रख दी है। आलम यह है कि करोड़ों की लागत से बिछाया गया डामर सड़क पर टिकने के बजाय पापड़ की तरह उखड़ रहा है। ग्रामीण हाथ से खींचकर डामर निकाल रहे हैं। इस पूरे खेल में मैदानी अफसरों की खामोशी और बड़े ठेकेदारों की मनमानी ने एक बड़े 'सड़क घोटाले' को जन्म दे दिया है।
रायगढ़ के ठेकेदार का टेंडर, काम कर रहे 'पेटी' वाले
इस पूरे प्रोजेक्ट में निर्माण की बदहाली की मुख्य जड़ 'पेटी कॉन्ट्रैक्ट' (Sub-letting) का पुराना और भ्रष्ट खेल है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बन रही इन महत्वपूर्ण सड़कों का मुख्य टेंडर रायगढ़ के बड़े ठेकेदार सुनील अग्रवाल और अनिल अग्रवाल के नाम पर है। लेकिन जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है। मुख्य ठेकेदार ने मुनाफा कमाने के चक्कर में पूरा काम स्थानीय 'पेटी ठेकेदारों' (छोटे ठेकेदारों) के हवाले कर दिया है। बताया जा रहा है कि इन छोटे ठेकेदारों के पास न तो सड़क निर्माण का कोई तकनीकी अनुभव है और न ही डामरीकरण के लिए जरूरी आधुनिक मशीनरी। बड़े ठेकेदार के रसूख और विभागीय अफसरों के कथित संरक्षण के चलते बिना किसी मापदंड के धड़ल्ले से घटिया निर्माण जारी है।
निर्माण स्थलों से जो तकनीकी कमियां सामने आ रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं। 31 सड़कों के इस जाल में मानक के अनुरूप सामग्री का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। सड़क के बेस में गिट्टी की मात्रा नाममात्र की है, जबकि डस्ट (धूल) का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। सबसे बड़ी लापरवाही डामरीकरण में बरती गई है—गर्म और मिक्स डामर के बजाय ठेकेदारों ने ठंडा डामर बिछा दिया है। यही वजह है कि निर्माण पूरा होने से पहले ही सड़कें उखड़ने लगी हैं।
जब स्थानीय ग्रामीणों ने इस घटिया निर्माण का विरोध किया और शिकायतें ऊपर तक पहुंचीं, तो विभाग ने जांच कर कार्रवाई करने के बजाय ठेकेदार को बचाने का रास्ता चुना। उखड़ते डामर को छिपाने के लिए प्रभावित हिस्सों पर डामर की एक और पतली परत चढ़ाकर लीपापोती (खानापूर्ति) कर दी गई। ग्रामीणों का साफ कहना है कि यह पैचवर्क चंद दिनों का मेहमान है। अगर सड़क को पूरी तरह से उखाड़कर नए सिरे से नहीं बनाया गया, तो यह सरकारी खजाने की खुली लूट होगी।
कोटा क्षेत्र के विधायक अटल श्रीवास्तव ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा, "पीएमजीएसवाई की इन महत्वपूर्ण सड़कों का टेंडर रायगढ़ के सुनील अग्रवाल को मिला है, लेकिन उन्होंने पूरा काम पेटी ठेकेदारों में बांट दिया है। इन छोटे ठेकेदारों के पास न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही समझ। बड़े ठेकेदार के संरक्षण में जो मनमानी चल रही है, उसका सीधा नतीजा यह होगा कि पहली ही बारिश में ये करोड़ों की सड़कें पूरी तरह बह जाएंगी और बैगा आदिवासियों का विकास कागजों तक सिमट कर रह जाएगा। तुरंत गुणवत्ता पर ध्यान देने की आवश्यकता है।"
मामले के तूल पकड़ने और मीडिया में किरकिरी (26 अप्रैल को प्रमुखता से प्रकाशित खबर) के बाद अब विभागीय अफसर नींद से जागते दिख रहे हैं। पीएमजीएसवाय के अधीक्षण अभियंता (SE) वरुण राजपूत ने डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा, "खराब सड़क की शिकायतों को पूरी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसकी जांच के लिए एक विशेष टीम का गठन किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर 'स्टेट क्वालिटी कंट्रोल टीम' को भी रायपुर से बुलाया जाएगा। जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों—चाहे वे अधिकारी हों या ठेकेदार—पर सख्त जिम्मेदारी तय की जाएगी।"
हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों को इन आश्वासनों पर भरोसा नहीं है। उनका कहना है कि पहले भी ऐसे वादे किए गए, लेकिन निष्पक्ष जांच कभी नहीं हुई।
Manishankar Pandey
मणिशंकर पांडेय Rashtriya Jagat Pahal के संस्थापक, मालिक एवं प्रबंध संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
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